







हमारा साहित्य
प्रमुख बिहारी बोलियों का तुलनात्मक अध्ययन
शुभा
बिहार की प्रमुख लोकभाषाओं (भोजपुरी, मगही- मैथिली) का तुलनात्मक भाषाशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करने वाली यह पहली पुस्तक है। इसमें इनकी आन्तरिक एकता-समानता के विवेचन-विश्लेषण के साथ-साथ इनकी निजी विशेषताओं का विवेचन भी विस्तारपूर्वक किया गया है। भाषा शास्त्र के अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी तो है ही, बिहार के लोकभाषाओं के क्षेत्र में शोध-कार्य करने वालों के लिए भी पर्याप्त सहायक सिद्ध होगी
‘शुभा’ कविताओं का संग्रह है। प्रत्येक काव्य-कृति साहित्य-जगत् को समृद्ध और सम्पन्न करती है। इन रचनाओं का प्रकाशन भी उसी दिशा में एक लघु प्रयत्न है। मुझे विश्वास है, सुधी पाठकों को इससे निश्चय ही कुछ संजोने लायक मिलेगा।
गीता - तत्त्व - दिग्दर्शन
हिन्दी में अनेकार्थता का अनुशीलन
प्रस्तुत पुस्तक अपने ढंग की निराली है। इसमें विनोबा जी की तीन कृतियों -‘गीता-प्रवचन’,‘स्थितप्रज्ञ-दर्शन’ और ‘गीताई चिन्तनिका’ का नवनीत निकाल कर साधकों के सामने रखा है। विनोबा जी ने स्वयं इन कृतियों के बारे में लिखा है, ‘गीता के बारे में मुझे जो कुछ कहना है, वह संक्षेप में उपर्युक्त तीनों (पुस्तकों) में सांगोपांग कहा है।’
हिन्दी में उपलब्ध अनेकार्थता का विवेचन,विश्लेषण, वर्गीकरण एवं इसके कारणों, प्रकारों और भाषागत अर्थी प्रभावों का निरूपण ही इस पुस्तक का मुख्य लक्ष्य रहा है। हिन्दी की अभिव्यक्ति-क्षमता और भाषा सामर्थ्य को रेखांकित करने का एक प्रयास।




तदपि कहे बिनु रहा न कोई
अपनी परम्परा की परख
इसमें गूढ़ ज्ञान की बोधगम्य व्याख्या तो है ही,‘गीता’ के कर्मवाद का व्यावहारिक विवेचन भी है। ‘मानस’ के चारित्रों के विश्लेषण को लेखक के गहन अध्ययन, आधुनिक चिन्तन, नई दृष्टि और भावुक मन ने रुचिकर, पठनीय तथा मननीय बना दिया है। ज्ञान और भक्ति की यह व्यंजना, सहृदय जिज्ञासुओं का ज्ञानवर्धन, अनुरंजन और परिष्करण तो करती ही है, कहीं न कहीं तू ही, तू ही की प्रतिध्वनि भी लगती है।
26 सितंबर 2026 को शीघ्र ही उपलब्ध
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