ऐतिहासिक चित्र दीर्घा


******* अगले दो सप्ताह में और महत्वपूर्ण चित्र जोड़े जाएंगे।********
यह दीर्घा डॉ. ओझा के वर्षों के शोध और साहित्यिक योगदान को दर्शाती है, जिसमें विभिन्न संगोष्ठियों, सम्मान समारोहों और महत्वपूर्ण मुलाकातों के चित्र शामिल हैं।


चित्र के पीछे की कहानी
हे मेरी सहचरी ! प्रियतमा ! जीवन संगिनी ! प्यारी !
तुम हो मेरे लिए सदा ही , सच में ,निधियाँ सारी।
तुम हो मेरी शक्ति, शिवा – सी , कलावती ! कल्याणी !
तुम अरूप की परम कृपा हो , मेरे हिय की वाणी।
तुम अनन्य आत्मीय भाव , तप –त्याग रूप काया हो,
जननी, जाया , सखी, स्वामिनी और सुखद छाया हो ।
तुम हो मेरी सकल प्रेरणा , साधन , सिद्धि , क्रिया हो,
तुम हो मेरी कल्पना मनोहर , तुम ही आदि त्रिया हो ।
जब- जब निष्ठा , क्षुद्र स्वार्थ से विचलित हुई है मेरी ,
जब स्वधर्म के पालन में दिग्भ्रमित बुद्धि हुई मेरी,
तेरे निर्देशन में चल कर बच मैं गया पतन से ,
सहधर्मिणी , तू सार्थक हो गयी अपने सत्य वचन से ।
मेरी उपलब्धियाँ तुम्हारे ही तप के प्रतिफल हैं।
तेरी अनुपस्थिति सोचकर होते प्राण विकल हैं ।
हे संतति की जीवन-दात्री ! अनुगामिनी सयानी ,
क्षमाशील धरती – सी तुम हो, मनोराज्य की रानी।
साथ रहा तेरा आगे तो, नभ भी दूर न होगा ,
गहन तिमिर मेंज्योति बनी तो ,पथ अवरुद्ध न होगा।
हे सहयात्री ! जग- जीवन में आगे बढ़ा करेंगे।
जो कुछ सुख –दुख आयेंगे हम मिलकर सहा करेंगे ।
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